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मौन

  रात बीत चली पुनः सुबह की ओर ख्वाब छुट गया आज भी वहीं कहीं सिमट गया ठहर गया मुझ में कहीं अधखिली पंखुड़ी सा सिकुड़ता आतुर हुआ कुछ कहने को पर कह न सका पिछली रात की तरह मोम पिघल गया यहीं कहीं मेरे सिरहाने अब मौन पसरा हुआ है मैं सिहर कर बस तांकता रह गया सुबह को मनोज शर्मा

पथभ्रष्ट

  रंग तरंग खूब घुमड़ता मेघ सा सजल सघन पंथहीन अविचल सा भ्रमरथ हृदय सकल सार सा विस्तार वो अंतहीन विकल विरल नित्य ठहर इधर उधर घना कौंधता गतिहीन अब मनोरथ मनोज शर्मा

मां

  मैंने कई मर्तवा देखा था तुम्हें आर्द्र नयनों से भीगते सिसकते कसकते चहकते महकते स्वयं को मिटते सिमटते बरबस चहकते हुए मर्म समेटे मुस्कुराहट बिखेरते गहन अंधकार को तराशते पुनः नवतरण लौटते अभिन्न असहज अक्षुण्ण सहृदय से नव कर्म में आशीष लिए नित्य तुम संग हो मनोज शर्मा