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बेबस-कहानी सरिता में प्रकाशित

 https://www.sarita.in/family-stories/hindi-story-bebas-part-1

मौन

  रात बीत चली पुनः सुबह की ओर ख्वाब छुट गया आज भी वहीं कहीं सिमट गया ठहर गया मुझ में कहीं अधखिली पंखुड़ी सा सिकुड़ता आतुर हुआ कुछ कहने को पर कह न सका पिछली रात की तरह मोम पिघल गया यहीं कहीं मेरे सिरहाने अब मौन पसरा हुआ है मैं सिहर कर बस तांकता रह गया सुबह को मनोज शर्मा

पथभ्रष्ट

  रंग तरंग खूब घुमड़ता मेघ सा सजल सघन पंथहीन अविचल सा भ्रमरथ हृदय सकल सार सा विस्तार वो अंतहीन विकल विरल नित्य ठहर इधर उधर घना कौंधता गतिहीन अब मनोरथ मनोज शर्मा

मां

  मैंने कई मर्तवा देखा था तुम्हें आर्द्र नयनों से भीगते सिसकते कसकते चहकते महकते स्वयं को मिटते सिमटते बरबस चहकते हुए मर्म समेटे मुस्कुराहट बिखेरते गहन अंधकार को तराशते पुनः नवतरण लौटते अभिन्न असहज अक्षुण्ण सहृदय से नव कर्म में आशीष लिए नित्य तुम संग हो मनोज शर्मा

बावस्ता

  इब्तिदा कब खत्म हुई ख़ैर गुमां तो रहा गर्दिश में लौटकर आसमां बदल गया कभी बतियाते थे गली कूचों नुक्कड़ों पर जब मंज़िलें करीब लगती थी आज़ खुद को लुटा कर भी हाथ कुछ न लगा हम किसी के न हुए कोई हमारा न हुआ सहर थम गयी आसमां बदल गया ज़िन्दगी मुसलसल चलती रही कहीं बावस्ता न रहा मनोज शर्मा

ख़्वाब

  तुम तो एक ख्वाब थे सरल से सरस से मुझ में स्थिर हो तुमने मोह लिया था इक रोज़ जब हर इक अदा से कनखियों से करपाश से आलिंगन से तुम हमसफर हो चले थे फिर कभी चहक कर कभी महक कर बरबस दिल मे बसते थे आज तुम हर पल संग हो करीब हो मेरे हम सफर बनकर ख्वाब नहीं वरन् सत्य से भी परे हो तुम मनोज शर्मा  

काला कऊआ

उस रोज़ हम दो मैं और वो काला कऊआ उस टीले पर बैठे थे निरस्त से कहीं खोये खोये से अजनबी बन उसने मुझे देखा मैंने उसे वो गुमसुम था बहुत देर से अकेला मेरी तरह सहसा इक हलचल हुई वो ठिठका और लपक कर उड़ गया दूसरे ठोर की ओर मैं ताकता रह गया उसी टीले की ओर जहां हम दो थे उस रोज़ मनोज शर्मा