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मनोज शर्मा की कहानी - उड़ान - The Purvai

मनोज शर्मा की कहानी - उड़ान - The Purvai

कोहरा

  कोहरा सुबह की नर्म धूप में हल्का गंधला कोहरा है जिसमें अक्सर चलते-चलते तुम्हें देखता हूं।हल्की स्निग्ध ठंडी हवा में तुम्हारी आंखों के कोर भीग जाते हैं तुम्हारे दोनों हाथ मेंहदी रंग के मखमली शाल में सिमटे हैं और एक सूखी-सी मुस्कुराहट के साथ तुम एक आकृति को सामने देखते हो और बिना किसी प्रतिक्रिया के आगे बढ़ जाते हो।हरी घास पर चलते हुए तुम एक मर्तबा पलटकर देखते हो वो आकृति अभी भी तुम्हें देख रही है बिना हिले ढुले जड़वत!   अक्सर राह में लोग मिल जाते हैं कोई अच्छा होता है कोई बहुत अच्छा और कोई बुरा भी होता है।कहीं भी मानसिक संतोष मिल छाए तो यकीनन ज़िन्दगी सुकुन भरी हो जाए।अब इस भागती दौड़ती ज़िन्दगी में यह ज़रूरी तो नहीं कि किसी से मिला जाए और यदि किसी से मिल भी लिया जाए तो उससे मिलना लाभकारी होगा।ये तो स्वयं पर निर्भर करता है कि किससे बात की जाए मित्रता की जाए या प्रेम किया जाए पर ऐसा कतही ज़रूरी नहीं कि हर मिलने वाले से मित्रता की जाए यह ख़ास आकर्षण किसी ख़ास में ही होता है जिससे बात करने को मन करे घंटों उसकी राह देखते रहें फिर यह ज़रूरी भी तो नहीं कि प्रेम के लिए किसी से मि...

सुख

  एक उम्र होती है,जब हर आदमी एक औसत सुख के दायरे में रहना सीख लेता है..उसके परे देखने की फुरसत उसके पास नहीं होती,यानि उस क्षण तक महसूस जब तक खुद उसके दायरे में ..आपने अक्सर  देखा होगा कि जिसे हम सुख कहते हैं वह एक ख़ास लमहे की चीज़ है۔۔

बेबस-कहानी सरिता में प्रकाशित

 https://www.sarita.in/family-stories/hindi-story-bebas-part-1

मौन

  रात बीत चली पुनः सुबह की ओर ख्वाब छुट गया आज भी वहीं कहीं सिमट गया ठहर गया मुझ में कहीं अधखिली पंखुड़ी सा सिकुड़ता आतुर हुआ कुछ कहने को पर कह न सका पिछली रात की तरह मोम पिघल गया यहीं कहीं मेरे सिरहाने अब मौन पसरा हुआ है मैं सिहर कर बस तांकता रह गया सुबह को मनोज शर्मा

पथभ्रष्ट

  रंग तरंग खूब घुमड़ता मेघ सा सजल सघन पंथहीन अविचल सा भ्रमरथ हृदय सकल सार सा विस्तार वो अंतहीन विकल विरल नित्य ठहर इधर उधर घना कौंधता गतिहीन अब मनोरथ मनोज शर्मा

मां

  मैंने कई मर्तवा देखा था तुम्हें आर्द्र नयनों से भीगते सिसकते कसकते चहकते महकते स्वयं को मिटते सिमटते बरबस चहकते हुए मर्म समेटे मुस्कुराहट बिखेरते गहन अंधकार को तराशते पुनः नवतरण लौटते अभिन्न असहज अक्षुण्ण सहृदय से नव कर्म में आशीष लिए नित्य तुम संग हो मनोज शर्मा

बावस्ता

  इब्तिदा कब खत्म हुई ख़ैर गुमां तो रहा गर्दिश में लौटकर आसमां बदल गया कभी बतियाते थे गली कूचों नुक्कड़ों पर जब मंज़िलें करीब लगती थी आज़ खुद को लुटा कर भी हाथ कुछ न लगा हम किसी के न हुए कोई हमारा न हुआ सहर थम गयी आसमां बदल गया ज़िन्दगी मुसलसल चलती रही कहीं बावस्ता न रहा मनोज शर्मा

ख़्वाब

  तुम तो एक ख्वाब थे सरल से सरस से मुझ में स्थिर हो तुमने मोह लिया था इक रोज़ जब हर इक अदा से कनखियों से करपाश से आलिंगन से तुम हमसफर हो चले थे फिर कभी चहक कर कभी महक कर बरबस दिल मे बसते थे आज तुम हर पल संग हो करीब हो मेरे हम सफर बनकर ख्वाब नहीं वरन् सत्य से भी परे हो तुम मनोज शर्मा  

काला कऊआ

उस रोज़ हम दो मैं और वो काला कऊआ उस टीले पर बैठे थे निरस्त से कहीं खोये खोये से अजनबी बन उसने मुझे देखा मैंने उसे वो गुमसुम था बहुत देर से अकेला मेरी तरह सहसा इक हलचल हुई वो ठिठका और लपक कर उड़ गया दूसरे ठोर की ओर मैं ताकता रह गया उसी टीले की ओर जहां हम दो थे उस रोज़ मनोज शर्मा

मेरा चश्मा

  मेरा चश्मा रोज देखता एक सुनहरा सपना कभी इठलाता कभी सहम जाता नज़र बचाता आंख उठाता यौंही बादलों में घिर जाता घने कोहरे सा नित् आता मेरा जीवन उजियारा कर जाता रंगीन सी बदली बदली जिन्दगी में महकते पुष्प सा रोज़ करीब आ जाता दर्द छुपाता उच्छवास रफ़्त बदल जीवन सतत बनाता मनोज शर्मा

प्रतिध्वनि

  दूर कहीं कोई बैठकर मीठा राग सुनाता है परम अभिव्यक्ति बोल में मृत्युभय नहीं छलाबा नहीं प्रेम है पराकाष्ठता है सम्पूर्ण जगत् का सा परमानन्द है आत्मसात् हुआ तुझे पाकर प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष तुम संग हो जैसे आसमां में दिवाकर है कालांतर से किंतु समक्ष होता नहीं नित्य तुम सा मुझ जैसा दूर हो जाता है मनोज शर्मा

सफ़र

  बंद दरवाज़ों से होता है रोज सामना अब यौं बार बार पलकें झपकना खुद को निहारना आइने में कभी लगता था कि वक्त थम जाये उस देहरी तले पर पीली घूप सामने है पहर भी गुज़र गये एक नयी इब्तिदा सामने अब आओ हमतुम फिर से बढ़ चले मनोज शर्मा

मासूम

  आंखे मुस्कुरा के ठहर जाती है मासूम बच्चे के से मन की अटखेलियां सी रोज़ भंवर से उठकर सिहर उठती है इक शफ़क थी कभी यहीं कहीं इक रोज़ बचपन भी बीत चला यौं बिखरते फूल सा उन दरीचो के नीचे जिनकी गंध भी थम गयी मटमैली मिट्टी पुनः रेत बन हाथ से बह चली गुज़रा वक्त आज असहज लगता है पर तुम भी संग नहीं अर्धसत्य करपाश किये हुए हो तुम मनोज शर्मा

मोहन राकेश

  मोहन राकेश कलम के सशक्त हस्ताक्षर थे 08 जनवरी उनका जन्म दिवस है।'आधे अधूरे','आषाढ़ का एक दिन',बेहतरीन नाटक हैं।मिस पाल,एक और जिंदगी और ज़ख्म जैसी कहानियों में वह स्वयं नज़र आते हैं।'अंधेरे बंद कमरे'उनकी लेखनी का नायाब उदाहरण हैं।मेरा सबसे प्रिय लेखक मोहन राकेश हैं जो कभी कभार मेरे अंदर आ बैठता है ।रेखाओं पर कुछ आकृति खींच लौट जाता है।कोई तो है जो अंदर है छटपटाता है शायद उन जैसा कुछ है जो कुछ कह जाता है कभी कभी। छह सात सालों में चेहरा बदल जाता हैं और चेहरा ही नहीं बल्कि सोच भी।जहां चेहरे पर सलवटे उभरने लगती है वहीं अब सोच भी परिपक्व होती चली जाती है।कई चेहरे एक समान या मिलते जुलते से नज़र आने लगते हैं।उसकी कमजोर होती आखों पर मोटा काला चश्मा आ गया था और केश भी सफेद होने के साथ साथ कम हो चुके थे।दरवाजे पर आहट होने पर कोई आकृति लम्बे गलियारे से होते हुए करीब आती जा रही थी।समय बीतने पर भी उसकी चाल में अभी भी वही थी एक चुस्ती सी जो कुछ समय पहले तक थी एक पल में वो मेरे सामने था।उसने मुझे पहचान लिया था अब हम घर के अंदर थे।अंदर पहुंचकर उसने उस जलती सिगरेट को बिस्तर के ...

मख़तूल

  किसी को मख़्तूल समझना बहुत आसान है क्योंकि कोई किसी के संदर्भ में जितना जानता है वो अपर्याप्त होता है दंभ में जीना स्वयं को अव्यवस्थित ही करता है।चरित्र समय बीतते बनता जाता है एक पल आंखों में बस जाता है तो दूसरे पल आंखों से उतर जाता है पर हर इंसान अपना किरदार निभाता रहता है अब चाहे आनंद से जीयो या अवसाद में।किसी की सूरत देख कभी मौसम टपकता है तो कभी भवें तन जाती है पर यही आंखे ऐसे चरित्र से कभी खिल जाती थी समय बदलता है मौसमों की तरह दुःख सुख किसी का नहीं होता अपनी अपनी श्रद्धा है अपनी अपनी सोच प्रेम कभी अपने चरम पर होता है तो कभी सिरे से नकार देता है।मख्तूल एक सोच है जो मात्र सोच से ऐसा बन जाता है और उसे दूसरों से इतर कर देता है पर इतना सत्य है कि मुक्कमल कोई नहीं जीवन में ग़लती सबसे होना लाज़िमी होता है पर अकारण मख्तूल कह देना कोई औचित्य नहीं।मात्र सोच के कारण कुछ भी समझ लेना और अलग रास्ता अख़्तियार कर लेना मेरी समझ से परे है बहरहाल दिन बीत गया एक पीली शाम आंखों के सामने है गहरी सोच रात के अंधेरों को फिर ओढ़ लेगी।सब इसी तरह जीते हैं बस किरदारों में फेरबदल होता जाता है आज मैं मख्त...

चेहरे

  सड़क पर घूमते अजनबी-से कुछ उदास चेहरे सिगरटों के धुएं में ज़िन्दगी टटोलते हैं खोखली दीवारों पर रोज़ वो आते हैं टिप्-टिप् बारिश की बूंदों से दो पल झांक कर दूसरों की ज़िन्दगी में पुनः लौट जाते हैं..! मनोज शर्मा

कर्मपथ

  तुम कर्म पथ बढ़ो मैं संग हूं कालांतर से पूर्ववत ना समझो हर ओर अंधकार नहीं वरन् भूलवश भटके हो यहीं कहीं पर स्मरण करो हर ओर उजाला है मौन हूं मैं अशांत नहीं हूं अभी समय नहीं अभिव्यक्ति का यदाकदा यथार्थ से अवगत रहो पुनः कर्मपथ पर लौट चलो सार नहीं है जीवन यों व्यर्थ अटहास न करो गहन संवेदनाओं से सजा सधा होता है आलौकिक क्षण कण कण में होता है अद्मुत जग तुम कदम कदम पर धर्म पथ पर चलो वैभव चरणबद्ध संग होगा तेरे मनोज शर्मा

पुत्रवधु

   मृगनयनी  मृदुभाषिणी चित में मर्म जगाती मेरी पुत्रवधु जर्जर थे हम तेरे आने से पूर्व जब आसंमा स्याह हो चला था भीगती आंखें एवं सिसकियां हर ओर निकलती थी तुम कल्पतरु से रोज़ भाग्य जगाते हो मनमोहक मुस्कान लिए हृदय में बस जाते हो ठौर बदल संगिनी बनी पुत्र से बढ़कर मान हो सम्मान हो पुत्री ही नही वरन् मेरे घर की शान हो मनोज शर्मा

जीवन

  जीवन क्या है एक कहकहा अंतहीन उलझन भरा रोज़ ठौर बदलता है त्रासद या मुस्कुराहट से भरा शायद मनोरम कभी कभी किंतु चिर परिचित स्वयं में लौटता कोई गहन अनकहा सा मनोज शर्मा